ऐसा शायद ही कोई होगा जिसने पल्स कैंडी न चखी हो। मात्र एक रुपए में मिलने वाली इस टॉफी ने लॉन्च के महज कुछ ही दिनों में मार्केट में अपनी पकड़ बना ली थी।

देखते ही देखते एक रुपए में बिकने वाले इस कैंडी ने 8 महीनों में 100 करोड़ और 2 साल में 300 करोड़ का व्यापार कर कामयाबी के नए परचम लहराए थे। और शुरुआत? टॉफी के बीच काले नमक की परत।

पल्स कैंडी शुरू करने के पीछे की सोच बहुत ही साधारण और एक पंक्ति संक्षिप्त था:
यदि प्रोडक्ट टैंगी है तो किसी के भी आंख अपने आप बंद हो जाने चाहिए अन्यथा वह मजेदार नहीं है।

पल्स कैंडी पर काम कर रहे आर एंड डी टीम के लिए डीएस ग्रुप के उपाध्यक्ष राजीव कुमार से यह एकमात्र निर्देश था।
डीएसजी ने विज्ञापन और प्रचार पर कोई राशि नहीं खर्च की थी। कैंडी लोगों को इतनी पसंद आई कि ग्राहकों ने ही एक दूसरे को बताकर प्रोडक्ट की बात फैलाई। केवल लोगों की बातों के माध्यम से पल्स ने लोकप्रियता प्राप्त की।

कई लोगों ने कैंडी के बारे में अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को बताया। लोगों में पल्स कैंडी की लोकप्रियता बढ़ी और कुछ ही दिनों में ऐसा हुआ कि फेसबुक पर ‘पल्स-फैन कम्युनिटीज’ बनने लगे। कुछ ने तो इसे ‘देश का पल्स’ भी कहा।

इस कैंडी ने सभी प्रतिस्पर्धाओं को पार कर लिया है और सिर्फ 8 महीनों में 100 करोड़ का आकड़ा पार करके सभी रिकॉर्डों को तोड़ दिया था। यह आंकड़ा भारी विज्ञापित कपंनियों जैसे कोक ज़ीरो, कोका कोला के आहार के बराबर है।

1 रुपए की कैंडी ने 2 साल में 300 करोड़ रुपये की बिक्री की। इस आकड़े ने ओरीओ बिस्किट को भी मात दे दी। 2011 में लॉन्च हुए ओरीओ ने 283 करोड़ का व्यापार किया था। वहीं 2011 में ही लॉन्च हुई मार्स बार ने 270 करोड़ रुपये का व्यापार किया था।

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