Home Daily Run Down घर की जिम्मेदारी से मंगल मिशन तक, पढ़िए रॉकेट वुमन की कहानी

घर की जिम्मेदारी से मंगल मिशन तक, पढ़िए रॉकेट वुमन की कहानी

114
0

चार साल पहले, भारतीय अंतरिक्षयान के सफलतापूर्वक मंगल कक्षा में प्रवेश करने पर, साड़ियों में महिलाओं के एक समूह की तस्वीर सामने आई थी। उसने देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम में महिलाओं द्वारा निभाई गई भूमिका पर प्रकाश डाला था उनमें से एक हैं बीपी दाक्षायणी।


उन्होनें उस टीम का नेतृत्व किया जिसने सैटेलाइट पर नजर रखी, यह तय किया कि वह कहां जाएगा और यह सुनिश्चित किया कि सैटेलाइट अपने रास्ते से विचलित न हो।
बीपी दाक्षायणी की कहानी हर भारतीय के लिए प्रेरणादायक हैं। जानिए घर की जिम्मेदारीओं के बीच कैसे बनी वह भारत की ‘रॉकेट वुमन’।

1960 के दशक में कर्नाटक के भद्रावती में जन्मी, दाक्षायणी अपने शहर की एकलौती महिला थी जिसने इंजीनियरिंग का अध्ययन किया था। दाक्षायणी मास्टर डिग्री लेने के लिए जाना चाहती थी लेकिन उनके पिता ने सोचा कि एक बीएससी ही पर्याप्त थी। अंत में, दाक्षायणी को अपना रास्ता मिला – और एक बार फिर अव्वल ग्रेड के साथ उन्होनें मास्टर डिग्री पूरी किया।

उसके बाद उन्होंने एक कॉलेज मेें गणित शिक्षक में रूप मेें नौकरी ली, लेकिन उनकी रूचि अंतरिक्ष और उपग्रहों में थी। एक दिन उन्होनें भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इएसरो में नौकरी के लिए विज्ञापन देखा। उन्होनें आवेदन किया – और उनका चयन भी कर लिया गया!

उन्हे कंप्यूटर प्रोग्रामिंग करने के लिए भी नियुक्त किया गया था, लेकिन उन्होनें वास्तव में कभी कंप्यूटर नहीं देखी थी। उन दिनों यह बात सामान्य थी। तो हर दिन, काम के बाद, वह घर पर जाती थी और घर के काम खत्म करने के बाद कंप्यूटर प्रोग्रामिंग पर किताबें पढ़ती थी।

इसरो में काम करना शुरू करने के एक साल बाद, उसके माता-पिता ने एक ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ मंजुनाथ बसवलिंगप्पा से उनकी शादी तय की। इसके बाद उन पर अचानक घर चलाने की भी जिम्मेदारी आ गई।

कार्यालय में, वह उपग्रहों को मार्गदर्शन करने के लिए जटिल गणना और कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की। घर पर, उन्हें अपने बड़े परिवार की देखभाल करनी होती थी।

वह करीब 5 बजे उठता थी, सात से आठ लोगों के लिए खाना बनाती थी और फिर कार्यालय जाती थी। शाम को, वह घर वापस जाते ही फिर खाना बनाती थी।

उनके कुछ रिश्तेदारों ने माना कि वह अपनी नौकरी छोड़ देगी, वह कहती है, “लेकिन मैं ऐसे व्यक्ति नहीं हूं जो आसानी से हार जाए।”

कई बार वह 1 बजे या 2 बजे सोने जाती थी, और काम करने के लिए 4 बजे उठ जाती थी।
उनके अनुसार प्रारंभिक वर्षों में, उनके पति को यह समझ में नहीं आता था कि वास्तव में वह क्या करती हैं। जब कभी-कभी वह शनिवार को काम करने जाती थी तो उनके पति को लगता था कि ऐसा इसलिए था क्योंकि वह अपना काम सही तरीके से नहीं कर रही थी।


लेकिन धीरे-धीरे वह यह समझने लगे कि उपग्रहों की चाल उनकी पत्नी की कार्यसूची को निर्धारित किया करती हैं। आज, डॉ बसवलिंगप्पा का कहना है कि उन्हें अपनी पत्नी और उनकी कड़ी मेहनत पर तर्क हैं। उनके बेटे और बेटी, दोनों इंजीनियर हैं और काम करने के लिए अमेरिका चले गए हैं।

दाक्षायणी आगे भी मंगल अध्ययन जारी रखना चाहता है। वह कहती है कि जिस ग्रह ने उन्हें यह मौका दिया की वह कई युवा भारतीय लड़कियों को प्रेरित कर सकें, उस पर वह रहना जरूर पसंद करेंगी।

Facebook Comments

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here